आधुनिकता के बाने में अंधकार-युग का प्रसार
हिंदी अखबारों में वाद-विवाद-संवाद संबंधी स्तम्भ कम ही होते हैं, जहाँ किसी लेख पर अथवा किसी विशेष मुद्दे पर बहस की जाती है, पूरे तर्क-वितर्क के साथ । यह चलन हिंदी अखबारों में मैंने अपने अब तक के अध्ययन-काल में ‘जनसत्ता’ के अलावा कहीं और नहीं देखा और निश्चय ही वे बेहद दिलचस्प बहसें होती हैं जहां आरोप और दृष्टिकोण के जवाब बेहद सुचिंतित तरीक़े से दिए जाते रहे हैं । इससे पाठकों को भी किसी विशेष मुद्दे पर और किसी विशेष दृष्टिकोण के अन्य आयामों पर सोचने-समझने में काफी मदद मिलती है । ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘द हिन्दू’ जैसे अंग्रेजी अखबारों में यह बेहद सामान्य चलन है । मैं व्यक्तिगत तौर पर चाहता हूँ कि हिंदी के अखबार ऐसी स्वस्थ बहसें कराएँ और ऐसा करने वालों को प्रोत्साहित करें । बहरहाल, इस भूमिका के बाद मैं इसी से जुड़े असल मुद्दे पर आता हूँ । दिनांक १७ सितम्बर २०१८ के ‘राष्ट्रीय सहारा’ अखबार में अवधेश कुमार का आलेख ‘चौराहे पर खड़ा देश’ प्रकाशित हुआ है । जैसा कि उनके कई लेखों में होता है, इसमें भी कई बातें बेहद विरोधाभासी और रूढ़िवादी क़िस्म की लिखी गयी हैं । मैं उन्हें इन मुद्दों पर बहस...