विवाद : विश्वनाथ त्रिपाठी, 'व्योमकेश दरवेश' और 'पाखी'

विश्वनाथ त्रिपाठी विवाद : ‘व्योमकेश दरवेश’ और ‘पाखी’ का संदर्भ

हिंदी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी को लेकर साहित्य जगत और सोशल मीडिया में काफ़ी हलचल है | इस हलचल के केंद्र में दो बातें हैं | पहली, उनके गुरु और हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से सम्बन्धित विश्वनाथ जी की प्रसिद्ध संस्मरणात्मक पुस्तक ‘व्योमकेश दरवेश’ के सम्बन्ध में है | और दूसरी, ‘पाखी’ पत्रिका में छपे साक्षात्कार में उनकी सौन्दर्यविषयक स्थापनाओं के सन्दर्भ में है, जिसे चयनात्मक रूप से गलत तरीके से छापकर विश्वनाथ जी का चरित्रहनन किया गया, न सिर्फ सोशल मीडिया पर बल्कि ‘दैनिक जागरण’ अखबार में भी | यह वही अखबार है, जिसने ‘कठुआ’ मामले में अदालत में विचाराधीन बात को ‘निर्णय’ के रूप में प्रकाशित किया और आरोपियों को बेगुनाह साबित किया | इसके अलावा उत्तर प्रदेश विधानसभा के दूसरे चरण के मतदान के ठीक बाद दैनिक जागरण समूह ने एक एग्जिट पोल अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया, यह चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों का खुला उल्लंघन था, जिसके लिए इसके ऑनलाइन संपादक शेखर त्रिपाठी को गिरफ्तार भी किया गया | इसके अलावा और भी कई ‘कथाएँ’ हैं इस अख़बार की |
बहरहाल, ‘पहली बात’ के सम्बन्ध में कुछ ही दिन पहले ‘दैनिक जागरण’ में अनंत विजय ने इस संबंध में एक लेख लिखा था | उन्होंने ‘पाखी’ पत्रिका के हालिया अंक में छपे विश्वनाथ जी के साक्षात्कार का संदर्भ देते हुए यह कहा है कि ‘व्योमकेश दरवेश’, जो काफ़ी प्रशंसित और पुरस्कृत पुस्तक रही है, में बेहद तथ्यात्मक भूलें की गयी हैं; इसलिए यह पुस्तक उस सम्मान योग्य नहीं है, जो इसे मिला | इस बहाने उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा और उससे जुड़े सभी हिंदी रचनाकारों को लपेटा और आयातित विचारधारा का आग्रही बताया |
साक्षात्कार लेने वालों में अल्पना मिश्र भी थीं, जो हजारी प्रसाद द्विवेदी के भाई की पौत्री हैं | साक्षात्कार के आरम्भ से ही अल्पना मिश्र विश्वनाथ जी पर नाराज़-सी दिखती हैं और बारम्बार ‘व्योमकेश दरवेश’ में हुई तथ्यात्मक भूलों की ओर ध्यान दिलाती हैं, मसलन हजारी प्रसाद द्विवेदी की माँ का नाम, द्विवेदी जी के गाँव का नाम, उनकी पुत्रियों के निधन का कारण आदि | अल्पना मिश्र ने यह शिकायत भी की कि उन्होंने  विश्वनाथ जी से कई बार मिलने की असफल कोशिश की |
अनंत विजय ने अपने लेख ‘सवालों के घेरे में ‘व्योमकेश दरवेश’’ में यह प्रश्न उठाया है कि भले ही हिंदी के बड़े मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह ने ‘व्योमकेश दरवेश’ को अपनी पुस्तक ‘दूसरी परम्परा की खोज’ से बेहतर और अप्रतिम पुस्तक बताया हो, लेकिन नामवर सिंह को हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य होने के बाद भी उपर्युक्त तथ्यात्मक भूलें क्यों नहीं दिखीं | इसके बाद अनंत विजय यशपाल के उपन्यास ‘झूठा सच’ को साहित्य अकादमी न मिलने का विवाद सामने रखते हैं | वे विश्वनाथ त्रिपाठी जी के हवाले से लिखते हैं कि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘झूठा सच’ को लेकर साहित्य अकादमी के तत्कालीन संयोजक हजारी प्रसाद द्विवेदी से यह शिकायत की थी कि इसमें जवाहर लाल नेहरू, जो अकादमी के अध्यक्ष भी थे, के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया गया है | अनंत जी ने विश्वनाथ जी का कथन उद्धृत किया है – “अगर यह सच है तो अकादमी के अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना और ‘मेरे नगपति मेरे विशाल’ के लेखक को क्या कहा जाए जो ‘अपने समय का सूर्य होने’ की घोषणा करता है |” आगे इस आधार पर अनंत विजय विश्वनाथ जी पर ‘दिनकर’ के प्रति पूर्वाग्रही होने का आरोप लगाते हैं | वे डी. एस. राव की पुस्तक ‘फाइव डिकेड्स : अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ साहित्य एकेडमी’ के हवाले से यह लिखते हैं कि जब नेहरू ने जानना चाहा कि यशपाल को पुरस्कार क्यों नहीं मिला, तो हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कहा कि ‘झूठा सच’ में नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग हुआ है | इस पर नेहरू कहते हैं कि यह कोई वज़ह नहीं होनी चाहिए पुरस्कार न देने के लिए, तो द्विवेदी जी उत्तर देते हैं कि यह एकमात्र कारण नहीं था और अन्य बेहतर किताबें भी थीं | अनंत विजय लिखते हैं कि ‘व्योमकेश दरवेश’ के दूसरे संस्करण में ‘दिनकर’ का नाम और ‘अपने समय का सूर्य’ वाली पंक्ति हटा ली गयी है | निष्कर्ष रूप में अनंत जी लिखते हैं कि यह दुर्भावनावश लिखा गया था, इसलिए तथ्य सामने आने पर अगले संस्करण में इसे हटा लिया गया |
यह देखना दिलचस्प है कि जिस पंक्ति को अगले संस्करण में संशोधित किया गया उसमें सिर्फ़ 'दिनकर' के उल्लेख वाले अंश को ही हटाया गया, बाकी वाक्यांश ज्यों का त्यों है - "अगर यह सच है तो अकादमी के अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना।" यानी एक तो लेखक उसे निर्णयात्मक नहीं मानता, उसमें संदेह और कुछ संशोधन की गुंजाइश पहले ही छोड़ा रहता है और दूसरे, अपने आत्मीय गुरु और सम्माननीय प्रधानमंत्री तक को इस आरोप के सही होने की स्थिति में दोषी ठहराने को लेकर दृढ़ है। यह उसकी निष्पक्षता और दृढ़ता का प्रमाण है।
जो भी हो, कोई भी सजग लेखक अपनी पुस्तक में भूलों और त्रुटियों के ध्यान दिलाये जाने पर संशोधन करता ही है | कई बार लेखक राजनीतिक दबाव और आलोचना से बचने के लिए भी संशोधन करने को बाध्य होता है | विश्वनाथ जी ने ‘व्योमकेश दरवेश’ के दूसरे संस्करण की भूमिका में लिखा भी है – “समीक्षकों ने पुस्तक में पुनरुक्तियों की आलोचना की है |...पुनः प्रकाशन के लिए ऐसे स्थलों को भरसक सुधार लिया गया है | तथ्यात्मक त्रुटियों को भी ठीक करने का प्रयास किया गया है |” अजय पाण्डेय नाम के एक व्यक्ति ने हाल ही में ज़िक्र किया है कि कैसे विश्वनाथ जी से यह बताने पर कि आचार्य द्विवेदी का गाँव बलिया से पश्चिम नहीं पूरब है, विश्वनाथ जी ने इसका परिमार्जन अगले संस्करण में कर दिया | इसके बाद संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती कि जब भी अगला संस्करण आएगा और लेखक सक्रिय रहेगा तो निश्चय ही नए उठे विवादों को वह शमित करेगा | अभी भी, मेरे देखे, पुस्तक में कुछ वाक्य-रचना और शब्द-रचना संबंधी दोष रह गए हैं, जिनकी सूचना लेखक तक पहुंची होगी, ऐसी आशा की जा सकती है | इसलिए अल्पना मिश्र को भी विनम्रता से अपनी बातें या तो पहले ही रखनी चाहिए थीं, यदि वे अपने कुल-सम्बन्धी बातों के बारे में इतनी संवेदनशील हैं या फिर आक्रामक होने की बजाय संशोधन के लिए विश्वनाथ जी से निवेदन कर लें | आखिर वे इतने वरिष्ठ आलोचक ठहरे | न भी मिल पाएं, तो पत्र-व्यवहार या दूरभाष-व्यवहार कर लें | वैसे भी यह संचार-क्रान्ति का युग  है |
‘दिनकर’ और साहित्य अकादमी विवाद के सन्दर्भ में एक और दिलचस्प घटना का उल्लेख विश्वनाथ जी ने उपर्युक्त पुस्तक में किया है | जैनेन्द्र द्वारा ‘मुक्तिबोध’ उपन्यास पर साहित्य अकादमी पाने हेतु एक सुन्दरी महिला के साथ द्विवेदी जी से मुलाकात का ज़िक्र है | और सम्मान समारोह में जैनेन्द्र के न आने पर ‘दिनकर’ का व्यंग्य बाण भी उल्लिखित है – “देखा हम लोगों ने नाक बंद करके इसे पुरस्कार दे दिया और यह बाज़ नहीं आया |”
‘दिनकर’, नरेंद्र कोहली, हरिवंश राय बच्चन आदि लेखकों के प्रति पूर्वाग्रह का निष्कर्ष निकालकर और विश्वनाथ त्रिपाठी, नामवर सिंह जैसे समान विचारधारा वाले विद्वानों को एक तरफ़ कठघरे में खड़ा कर देश की वर्तमान राजनीति का ही जैसे उल्था किया जा रहा है | ‘व्योमकेश दरवेश’ में नामवर सिंह पर ही व्यंग्य करते हुए विश्वनाथ जी ने ‘रस सिद्धांत’ पुस्तक के विमोचन का नामवर द्वारा मज़ाक उड़ाने के संबंध में लिखा है– “तब आज के सर्वाधिक व्यस्त लोकार्पक साहित्यकार डॉ. नामवर सिंह ने ग्रन्थ-विमोचन का मज़ाक उड़ाया था |”
इसी प्रकार नामवर सिंह और डॉ. नगेन्द्र सम्बन्धी घटना का ज़िक्र भी है कि कैसे नामवर की ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ को पुरस्कार दिलाने की मंशा डॉ. नगेन्द्र के योजना-कार्यान्वयन वाले व्यक्तित्व से पीछे रह गयी और अंततः पुरस्कार मिला नगेन्द्र की पुस्तक ‘रस-सिद्धांत’ को | नामवर ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर दबाव बनाने की भी काफ़ी कोशिश की थी, इसका भी ज़िक्र है | और यह सब इसके बावजूद कि नामवर विश्वनाथ जी के सतीर्थ, आचार्य द्विवेदी के ज्येष्ठ शिष्य और विश्वनाथ जी के बेहद आत्मीय रहे हैं | ज़ाहिर है, विश्वनाथ जी ने भले ही पुस्तक के आरम्भ में विनम्रतापूर्वक यह स्वीकार किया है कि उन्होंने तटस्थता के साथ नहीं लिखा है और कोई अपने गुरु के जीवन के बारे में कैसे तटस्थ होकर लिख सकता है, लेकिन व्यवहार में उन्होंने पर्याप्त तटस्थता और ईमानदारी बरतने का प्रयास किया है |
रामविलास शर्मा अपनी ‘ध्वंसकारी(मत्सरी) आलोचना’ के लिए प्रसिद्ध रहे हैं | ‘निराला की साहित्य साधना’ तीन खण्डों में थी और खंड पर पुरस्कार देने का कोई नियम नहीं था | निर्णायक-मंडल के दो सदस्यों बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ और सुमित्रानंदन पन्त पर इस पुस्तक में काफी ‘कुख्यात और निद्रानाशक’ बातें लिखी गयी थीं | लेकिन इन दोनों सदस्यों ने महान उदारता दिखाते हुए इसी पुस्तक को पुरस्कार हेतु प्रस्तावित किया |
बहरहाल, ऐसे कई क़िस्से वर्णित हैं जिस पर लोग आहत होकर सवाल उठा सकते हैं और हो सकता है कि लेखक सफाई पेश करने की बजाय संशोधन ही कर दे | निश्चय ही यह लेखक का विवेकाधिकार है | यह आश्चर्य की बात है कि क्या कुछ अनजानी तथ्यात्मक भूलों से एक भरी-पूरी किताब का पूरा विज़न ही नष्ट हो जाता है, जैसा कि अनंत विजय प्रतिपादित कर रहे हैं ? मेरे ख्याल में, उनकी पाठ-विधि में गंभीर खामियां हैं | किसी पुस्तक को पुरस्कार उसके द्वारा स्थापित मूल्यों के लिए दिया जाता है, कुछ नया सृजित करने के लिए दिया जता है, जिससे हमारी परम्परा समृद्ध हो, न कि इसलिए कि वह कुछ विचित्र या नया-पुराना  तथ्य बयान कर रही है। साहित्य का गंभीर अध्येता यह जानता है कि रचना तथ्य में या विषय में नहीं, वस्तु में निहित है और उसी के आधार पर रचना का मूल्यांकन करने की भारतीय परम्परा रही है, जिसे बाद में पश्चिम में भी आधुनिक चिन्तकों ने स्वीकारा |
(‘दूसरी बात’ की बात अगली किश्त में )

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