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‘अंधाधुन’ (The Blind Melody)

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बंदगोभी के एक खेत में एक अंधा-सा दिखने वाला खरगोश, जिसकी एक आँख कटी है और दूसरी पथरीली है, कई गोभियाँ कुतर चुका है और उसे मारने के लिए खेत का रक्षक बन्दूक से निशाना साधता हुआ आगे बढ़ता है ; खरगोश कुलाँचे मारता हुआ सड़क किनारे मील के पत्थर के पास जाकर रुका रहता है. गोली चलती है लेकिन उसके बाद का दृश्य हमें नहीं दिखता ; सिर्फ़ एक गाड़ी के अचानक रुकने की आवाज़ और एक चीख का मिश्रित स्वर सुनाई देता है. आगे की कहानी में यह आरंभिक दृश्य कहीं भी सम्बन्ध नहीं रखता क्योंकि यह सिर्फ़ अंत के लिए है, कहानी और पात्रों के कर्मों को तार्किक या सिमेट्रिकल न्याय तक पहुंचाने के लिए. यह अल्फ्रेड हिचकॉक के भारतीय अवतार श्रीराम राघवन की शैली है, जिन्होंने ‘एक हसीना थी’, ‘जॉनी गद्दार’ और ‘बदलापुर’ जैसी थ्रिलर फिल्मों से अपनी पहचान बनाई है. फिल्म के नाम में व्याकरणिक चूक दिख सकती है, लेकिन हो सकता है अंधाधुंध कार्यों से नाम-साम्य दिखाने के लिए निर्देशक ने इसे चुना हो. पियानोवादक नायक एक ‘पूर्ण और उत्तम धुन’ की तलाश में अपने को अंधा दिखाने का अभिनय करता है क्योंकि उसका मानना है कि इससे ध्यान का भटकाव नहीं होत...

आधुनिकता के बाने में अंधकार-युग का प्रसार

हिंदी अखबारों में वाद-विवाद-संवाद संबंधी स्तम्भ कम ही होते हैं, जहाँ किसी लेख पर अथवा किसी विशेष मुद्दे पर बहस की जाती है, पूरे तर्क-वितर्क के साथ । यह चलन हिंदी अखबारों में मैंने अपने अब तक के अध्ययन-काल में ‘जनसत्ता’ के अलावा कहीं और नहीं देखा और निश्चय ही वे बेहद दिलचस्प बहसें होती हैं जहां आरोप और दृष्टिकोण के जवाब बेहद सुचिंतित तरीक़े से दिए जाते रहे हैं । इससे पाठकों को भी किसी विशेष मुद्दे पर और किसी विशेष दृष्टिकोण के अन्य आयामों पर सोचने-समझने में काफी मदद मिलती है । ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘द हिन्दू’ जैसे अंग्रेजी अखबारों में यह बेहद सामान्य चलन है । मैं व्यक्तिगत तौर पर चाहता हूँ कि हिंदी के अखबार ऐसी स्वस्थ बहसें कराएँ और ऐसा करने वालों को प्रोत्साहित करें । बहरहाल, इस भूमिका के बाद मैं इसी से जुड़े असल मुद्दे पर आता हूँ । दिनांक १७ सितम्बर २०१८ के ‘राष्ट्रीय सहारा’ अखबार में अवधेश कुमार का आलेख ‘चौराहे पर खड़ा देश’ प्रकाशित हुआ है । जैसा कि उनके कई लेखों में होता है, इसमें भी कई बातें बेहद विरोधाभासी और रूढ़िवादी क़िस्म की लिखी गयी हैं । मैं उन्हें इन मुद्दों पर बहस...

विकास का एक और यथार्थ

हम देश के विकास की और हाशिए पर पड़े लोगों के विकास की कितनी ही बातें आँकड़ों के माध्यम से बारहां करते रहते हैं, लेकिन उनमें इन बातों की मानवीय पृष्ठभूमि या संवेदना अक्सर ही ओझल रहती है। जीवन की मूलभूत ज़रूरतों से लेकर आर्थिक समावेशन तक की बात, यदि हम अपने आस-पास काम करने वाले सामान्य निम्नवर्गीय लोगों को देखें तो, झूठी-सी नज़र आती है। मेरे गोरखपुर शहर में एक निजी स्कूल में बस चलाने वाला एक दलित ड्राइवर जो अक्सर हमारी गाड़ियाँ भी चलाता है, मेरे घर में काम करने वाला गोंडा जिले के एक गाँव का बेहद ग़रीब ब्राह्मण जो घर की देखभाल करता है और मेरे ही घर में साफ-सफ़ाई के लिए आने वाली एक दलित महिला -- ये सामान्य उदाहरण हैं जो आपको अक्सर हमारे समाज में दिख जाएँगे। इनके माध्यम से मैं कुछ स्थितियाँ सामने रख रहा हूँ। आप भी देखें और विचार करें। उपर्युक्त तीनों ही शख़्स 40 की उम्र के आसपास हैं और तीनों की आय कमोबेश समान है। तीनों ही अनपढ़ हैं। इन तीनों में सिर्फ़ ब्राह्मण व्यक्ति के पास नाममात्र का बैंक खाता है। लेकिन वह उसका कुछ भी प्रगतिशील उपयोग नहीं कर पाता। इनमें से किसी को भी एटीएम चलाना, मेसेज प...

विवाद : विश्वनाथ त्रिपाठी, 'व्योमकेश दरवेश' और 'पाखी'

विश्वनाथ त्रिपाठी विवाद : ‘व्योमकेश दरवेश’ और ‘पाखी’ का संदर्भ हिंदी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी को लेकर साहित्य जगत और सोशल मीडिया में काफ़ी हलचल है | इस हलचल के केंद्र में दो बातें हैं | पहली, उनके गुरु और हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से सम्बन्धित विश्वनाथ जी की प्रसिद्ध संस्मरणात्मक पुस्तक ‘व्योमकेश दरवेश’ के सम्बन्ध में है | और दूसरी, ‘पाखी’ पत्रिका में छपे साक्षात्कार में उनकी सौन्दर्यविषयक स्थापनाओं के सन्दर्भ में है, जिसे चयनात्मक रूप से गलत तरीके से छापकर विश्वनाथ जी का चरित्रहनन किया गया, न सिर्फ सोशल मीडिया पर बल्कि ‘दैनिक जागरण’ अखबार में भी | यह वही अखबार है, जिसने ‘कठुआ’ मामले में अदालत में विचाराधीन बात को ‘निर्णय’ के रूप में प्रकाशित किया और आरोपियों को बेगुनाह साबित किया | इसके अलावा उत्तर प्रदेश विधानसभा के दूसरे चरण के मतदान के ठीक बाद दैनिक जागरण समूह ने एक एग्जिट पोल अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया, यह चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों का खुला उल्लंघन था, जिसके लिए इसके ऑनलाइन संपादक शेखर त्रिपाठी को गिरफ्तार भी किया गया | इसके अलावा और...

कुंठा

...तुम्हारी आकुलताएँ, व्यग्रताएँ मैं नहीं जानता और, अनुमान कर के भी मानना नहीं चाहता ! इस प्रकार अपने अहम् को तुष्ट कर, किन्तु अगले ही क्षण इसे जड़ता मानकर कुंठित हुआ जाता हूँ लुंठित हुआ जाता हूँ...!