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‘अंधाधुन’ (The Blind Melody)

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बंदगोभी के एक खेत में एक अंधा-सा दिखने वाला खरगोश, जिसकी एक आँख कटी है और दूसरी पथरीली है, कई गोभियाँ कुतर चुका है और उसे मारने के लिए खेत का रक्षक बन्दूक से निशाना साधता हुआ आगे बढ़ता है ; खरगोश कुलाँचे मारता हुआ सड़क किनारे मील के पत्थर के पास जाकर रुका रहता है. गोली चलती है लेकिन उसके बाद का दृश्य हमें नहीं दिखता ; सिर्फ़ एक गाड़ी के अचानक रुकने की आवाज़ और एक चीख का मिश्रित स्वर सुनाई देता है. आगे की कहानी में यह आरंभिक दृश्य कहीं भी सम्बन्ध नहीं रखता क्योंकि यह सिर्फ़ अंत के लिए है, कहानी और पात्रों के कर्मों को तार्किक या सिमेट्रिकल न्याय तक पहुंचाने के लिए. यह अल्फ्रेड हिचकॉक के भारतीय अवतार श्रीराम राघवन की शैली है, जिन्होंने ‘एक हसीना थी’, ‘जॉनी गद्दार’ और ‘बदलापुर’ जैसी थ्रिलर फिल्मों से अपनी पहचान बनाई है. फिल्म के नाम में व्याकरणिक चूक दिख सकती है, लेकिन हो सकता है अंधाधुंध कार्यों से नाम-साम्य दिखाने के लिए निर्देशक ने इसे चुना हो. पियानोवादक नायक एक ‘पूर्ण और उत्तम धुन’ की तलाश में अपने को अंधा दिखाने का अभिनय करता है क्योंकि उसका मानना है कि इससे ध्यान का भटकाव नहीं होत...