‘अंधाधुन’ (The Blind Melody)
बंदगोभी के एक खेत में एक अंधा-सा दिखने वाला खरगोश, जिसकी एक आँख कटी है और दूसरी पथरीली है, कई गोभियाँ कुतर चुका है और उसे मारने के लिए खेत का रक्षक बन्दूक से निशाना साधता हुआ आगे बढ़ता है ; खरगोश कुलाँचे मारता हुआ सड़क किनारे मील के पत्थर के पास जाकर रुका रहता है. गोली चलती है लेकिन उसके बाद का दृश्य हमें नहीं दिखता ; सिर्फ़ एक गाड़ी के अचानक रुकने की आवाज़ और एक चीख का मिश्रित स्वर सुनाई देता है. आगे की कहानी में यह आरंभिक दृश्य कहीं भी सम्बन्ध नहीं रखता क्योंकि यह सिर्फ़ अंत के लिए है, कहानी और पात्रों के कर्मों को तार्किक या सिमेट्रिकल न्याय तक पहुंचाने के लिए. यह अल्फ्रेड हिचकॉक के भारतीय अवतार श्रीराम राघवन की शैली है, जिन्होंने ‘एक हसीना थी’, ‘जॉनी गद्दार’ और ‘बदलापुर’ जैसी थ्रिलर फिल्मों से अपनी पहचान बनाई है.
फिल्म के नाम में व्याकरणिक चूक दिख सकती है, लेकिन हो सकता है अंधाधुंध कार्यों से नाम-साम्य दिखाने के लिए निर्देशक ने इसे चुना हो. पियानोवादक नायक एक ‘पूर्ण और उत्तम धुन’ की तलाश में अपने को अंधा दिखाने का अभिनय करता है क्योंकि उसका मानना है कि इससे ध्यान का भटकाव नहीं होता और ‘फ़ोकस’ सिर्फ़ सुनने पर बना रहता है, जिससे उसकी कला में निखार आता है. उसकी यह सनक उसे अपने लक्ष्य तक अंत में पहुँचा तो देती है, लेकिन इस यात्रा में उसे सचमुच अंधा हो जाना पड़ता है ; हालांकि अंतिम दृश्य में वह आँखें ठीक कराने के बाद भी यूरोप में जाकर शोहरत हासिल करता है और अपने अंधेपन का अभिनय ज़ारी रखता है. तभी वह हमारे सामने, राघवन के लगभग हर पात्र की तरह, अपनी सारी निश्छलता को उतारकर एक ग्रे-शेड लिए हुए प्रदीप्त हो उठता है और दर्शक इस कमीनेपन पर सिर्फ मुस्करा पड़ता है, क्योंकि वास्तविक जीवन में हम सब ग्रे हैं, काले या सफ़ेद नहीं. इसका एकमात्र अपवाद फिल्म में राधिका आप्टे का किरदार है, जो सीधा है, यानी वह जो कहता है वही करता है और उसका कोई एक दूसरा या तीसरा निहित उद्देश्य नहीं है. यहाँ तक कि फिल्म में मौजूद बच्चा भी धूर्त और चालाक किस्म का है, जो अपनी सीमा में कई तरीकों से कमाई करने की जुगत में रहता है.
ओलिविएर ट्रीनर की फ्रेंच लघु-फिल्म L'accordeur (The Piano Tuner, 2010) से राघवन की यह फिल्म प्रेरित है, जिसे उन्होंने फिल्म के अंत में स्वीकार भी किया है. फिल्म में कैमरा का काम बेहद नपा-तुला और शानदार है. सिनेमेटोग्राफी देखकर कई आलोचकों को राघवन में हिचकॉक के दर्शन होते हैं, विशेषकर ‘वर्टिगो’ फिल्म से समानता को याद कर.
8 मिनट लंबा पहले हाफ़ का दृश्य, जिसने निर्देशक को पूरी फिल्म बनाने पर मजबूर किया, बेहद बारीक़ बुनावट और चुस्त संपादन का एक अद्भुत उदाहरण है. ७० के दशक के संगीत का खूब प्रयोग किया गया है और सुखद आश्चर्य के रूप में उस दौर के नायक रहे अनिल धवन को भी फिल्म में लिया गया है, किशोर के सुमधुर और सुपरहिट गानों के साथ. धवन को अपनी बीती यादों में डूबे रहने वाले गुज़रे जमाने K स्टार के रूप में दिखाया गया है, जहां निर्देशक ने उनकी फिल्मों के खूबसूरत पोस्टर्स के साथ धवन के पात्र प्रमोद सिन्हा का आवास वर्णित किया है. ‘ये जीवन है’, ‘तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम’, ‘गुज़र जायें दिन दिन दिन’ आदि गाने संगीत पक्ष को मधुर बनाते हैं, पियानो पर नायक के बजाने और गाने में एक तर्कसंगति पैदा करते हैं और अनिल धवन के रील पात्रों को बेहद करीब ले आकर दर्शकों को ७० के दशक के फ़िल्म-संगीत, ‘छायागीत’ और ‘चित्रहार’ की यादों में डुबा देते हैं. इसमें अमित त्रिवेदी का ४ मिनट से ज्यादा का पियानो ट्यून भी है, जो शानदार है. निर्देशक का संगीत और पल्प-फिल्मों का यह प्रेम उनकी फिल्मों में कई नए मोड़ भी देता है, जैसे जॉनी गद्दार में ‘परवाना’ फिल्म का दृश्य.
8 मिनट लंबा पहले हाफ़ का दृश्य, जिसने निर्देशक को पूरी फिल्म बनाने पर मजबूर किया, बेहद बारीक़ बुनावट और चुस्त संपादन का एक अद्भुत उदाहरण है. ७० के दशक के संगीत का खूब प्रयोग किया गया है और सुखद आश्चर्य के रूप में उस दौर के नायक रहे अनिल धवन को भी फिल्म में लिया गया है, किशोर के सुमधुर और सुपरहिट गानों के साथ. धवन को अपनी बीती यादों में डूबे रहने वाले गुज़रे जमाने K स्टार के रूप में दिखाया गया है, जहां निर्देशक ने उनकी फिल्मों के खूबसूरत पोस्टर्स के साथ धवन के पात्र प्रमोद सिन्हा का आवास वर्णित किया है. ‘ये जीवन है’, ‘तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम’, ‘गुज़र जायें दिन दिन दिन’ आदि गाने संगीत पक्ष को मधुर बनाते हैं, पियानो पर नायक के बजाने और गाने में एक तर्कसंगति पैदा करते हैं और अनिल धवन के रील पात्रों को बेहद करीब ले आकर दर्शकों को ७० के दशक के फ़िल्म-संगीत, ‘छायागीत’ और ‘चित्रहार’ की यादों में डुबा देते हैं. इसमें अमित त्रिवेदी का ४ मिनट से ज्यादा का पियानो ट्यून भी है, जो शानदार है. निर्देशक का संगीत और पल्प-फिल्मों का यह प्रेम उनकी फिल्मों में कई नए मोड़ भी देता है, जैसे जॉनी गद्दार में ‘परवाना’ फिल्म का दृश्य.
सभी कलाकारों का अभिनय उत्कृष्ट है, विशेषकर तब्बू और आयुष्मान का. तब्बू का डार्क और ग्रे चरित्र एक बार फिर दर्शकों के सामने पूरी मजबूती के साथ आता है और ब्लैक ह्यूमर/ब्लैक कॉमेडी (ब्लू कॉमेडी नहीं) के साथ दर्शकों को खल कार्य-प्रक्रिया में हँसाता भी है और थ्रिलर फिल्म का ‘अब आगे क्या’ वाला टोन भी विकसित करता रहता है. यह लगभग सभी चरित्रों का मूल भाव है और इसलिए फिल्म का भी. चाहे वह पियानोवादक हो, एक असफल अभिनेत्री हो, डॉक्टर हो, बच्चा हो, इंस्पेक्टर हो, ऑटो ड्राइवर हो या फिर खरगोश हो. जैसा कि पहले बताया गया, इसके अपवाद रूप में सिर्फ़ राधिका आप्टे और धवन का किरदार है.
अगर वर्गीकृत करना हो तो यहाँ तब्बू सबसे खल पात्र है, जिसमें कोई नैतिकता नहीं है. वह नायक द्वारा जान बचाने के बाद भी उसे अंत में मारने का निश्चय करती है क्योंकि तब्बू यानी सिमी को लगता है कि वह उसका राज़फ़ाश अब भी कर सकने में सक्षम है. और सिमेट्री देखिए निर्देशक की – जिस अंधे बने व्यक्ति को सिमी का पति सिमी की शादी की सालगिरह पर उपहार देने के लिए अपने और किशोर के गानों को पियानो पर बजाने के लिए बुलाता है, वह धवन की लाश देख लेता है लेकिन अंधेपन के अभिनय में ही पियानो से बेहद सामयिक और सटीक धुनें निकालता है. सिमी उसे अंततः अंधा बना देती है और मारना चाहती है, लेकिन अंधे व्यक्ति की तरह पथरीली आँख लिए हुए खरगोश अचानक मील के पत्थर के पास से गोली की आवाज़ पर उछलकर सिमी की गाड़ी के आगे आ जाता है और सिमी उस अंधे खरगोश के कारण मारी जाती है, जिसमें वह डॉक्टर भी मौजूद रहता है, जो कभी अपने लालच और कभी अपनी थोड़ी बची नैतिकता के वशीभूत पियानोवादक और सिमी की किडनी, लिवर और आँखें बेचकर करोड़पति बनना चाहता है. जिसके माध्यम से निर्देशक ने जीवन की परिभाषा देनी चाही है कि जीवन क्या है - यह आपके लिवर पर निर्भर करता है. ज़ाहिर है, राघवन के यहाँ लिवर भी निरुद्देश्य नहीं है.
PS : जैसा कि सभी ने इस फिल्म के बारे में कहा, फिल्म आदि से अंत तक नज़र गड़ा कर और कान खोल कर देखें ; सभी सूत्र दिलचस्प तरीक़े से गुँथे हुए हैं, वह गोभी कुतरने वाला अंधा खरगोश हो, अंधे व्यक्ति को रस्सी फंसाने वाला बच्चा हो या आदमी का लिवर ही क्यों न हो !



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