कुंठा

...तुम्हारी आकुलताएँ, व्यग्रताएँ मैं नहीं जानता
और, अनुमान कर के भी मानना नहीं चाहता !
इस प्रकार अपने अहम् को तुष्ट कर,
किन्तु अगले ही क्षण इसे जड़ता मानकर
कुंठित हुआ जाता हूँ
लुंठित हुआ जाता हूँ...!

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