विकास का एक और यथार्थ
हम देश के विकास की और हाशिए पर पड़े लोगों के विकास की कितनी ही बातें आँकड़ों के माध्यम से बारहां करते रहते हैं, लेकिन उनमें इन बातों की मानवीय पृष्ठभूमि या संवेदना अक्सर ही ओझल रहती है। जीवन की मूलभूत ज़रूरतों से लेकर आर्थिक समावेशन तक की बात, यदि हम अपने आस-पास काम करने वाले सामान्य निम्नवर्गीय लोगों को देखें तो, झूठी-सी नज़र आती है।
मेरे गोरखपुर शहर में एक निजी स्कूल में बस चलाने वाला एक दलित ड्राइवर जो अक्सर हमारी गाड़ियाँ भी चलाता है, मेरे घर में काम करने वाला गोंडा जिले के एक गाँव का बेहद ग़रीब ब्राह्मण जो घर की देखभाल करता है और मेरे ही घर में साफ-सफ़ाई के लिए आने वाली एक दलित महिला -- ये सामान्य उदाहरण हैं जो आपको अक्सर हमारे समाज में दिख जाएँगे। इनके माध्यम से मैं कुछ स्थितियाँ सामने रख रहा हूँ। आप भी देखें और विचार करें।
उपर्युक्त तीनों ही शख़्स 40 की उम्र के आसपास हैं और तीनों की आय कमोबेश समान है। तीनों ही अनपढ़ हैं। इन तीनों में सिर्फ़ ब्राह्मण व्यक्ति के पास नाममात्र का बैंक खाता है। लेकिन वह उसका कुछ भी प्रगतिशील उपयोग नहीं कर पाता। इनमें से किसी को भी एटीएम चलाना, मेसेज पढ़ना या अपनी आय को खाते में रखकर कुछ जमापूँजी तैयार करना नहीं आता और न इसके लिए इनके पास पर्याप्त धन है।ब्राह्मण व्यक्ति का सस्ता मोबाइल महीनों से खराब है और वह नया ले पाने की स्थिति में नहीं है। बैंक से मोबाइल के जुड़ाव का उसके लिए कोई अर्थ नहीं है। ड्राइवर कभी-कभार किसी अन्य के खाते से पैसे निकलवाता है और एटीएम पिन वग़ैरह उसको बताता है जिससे वह धन निकलवाएगा। अक्सर इसके लिए उसे एटीएम के बाहर इंतज़ार करना होता है, जहाँ वह किसी परिचित या विश्वसनीय चेहरे को पा सके। ब्राह्मण व्यक्ति को कभी अपनी आय को खाते में डालते नहीं देखा गया। इनमें से किसी के भी धन के व्यवहार में नोटबन्दी के पहले से बाद के दौर में कोई परिवर्तन नहीं आया है।
ड्राइवर की जीवनशैली और आय कुछ विविध है क्योंकि आजकल ड्राइवर की माँग हर जगह है। बाक़ी दो के पास घर की देखभाल या दिहाड़ी के अलावा कोई कौशल नहीं। दोनों दलितों को सरकारी योजनाओं में सिर्फ़ बीपीएल राशनकार्ड की सुविधा का लाभ प्राप्त है। इसमें भी ड्राइवर का राशनकार्ड 2 महीने से अवैध हो चला है, क्योंकि वह आधार कार्ड से लिंक नहीं था और आधार कार्ड से ऑनलाइन लिंक करने वाले उसे अद्यतन करने की सुविधा नहीं दे पा रहे हैं और वह ऑफ़लाइन फॉर्म भर कर अब तक राशन कार्ड पुनः पाने के लिए भटक रहा है। चूँकि वह नौकरशाही और सरकारी तंत्र के जाल में पहले भी लिपट चुका है इसलिए वह मुतमईन है कि 'अभी इतनी जल्दी कहाँ उसका काम हो पाएगा।'
उपर्युक्त तीनों ही शख़्स 40 की उम्र के आसपास हैं और तीनों की आय कमोबेश समान है। तीनों ही अनपढ़ हैं। इन तीनों में सिर्फ़ ब्राह्मण व्यक्ति के पास नाममात्र का बैंक खाता है। लेकिन वह उसका कुछ भी प्रगतिशील उपयोग नहीं कर पाता। इनमें से किसी को भी एटीएम चलाना, मेसेज पढ़ना या अपनी आय को खाते में रखकर कुछ जमापूँजी तैयार करना नहीं आता और न इसके लिए इनके पास पर्याप्त धन है।ब्राह्मण व्यक्ति का सस्ता मोबाइल महीनों से खराब है और वह नया ले पाने की स्थिति में नहीं है। बैंक से मोबाइल के जुड़ाव का उसके लिए कोई अर्थ नहीं है। ड्राइवर कभी-कभार किसी अन्य के खाते से पैसे निकलवाता है और एटीएम पिन वग़ैरह उसको बताता है जिससे वह धन निकलवाएगा। अक्सर इसके लिए उसे एटीएम के बाहर इंतज़ार करना होता है, जहाँ वह किसी परिचित या विश्वसनीय चेहरे को पा सके। ब्राह्मण व्यक्ति को कभी अपनी आय को खाते में डालते नहीं देखा गया। इनमें से किसी के भी धन के व्यवहार में नोटबन्दी के पहले से बाद के दौर में कोई परिवर्तन नहीं आया है।
ड्राइवर की जीवनशैली और आय कुछ विविध है क्योंकि आजकल ड्राइवर की माँग हर जगह है। बाक़ी दो के पास घर की देखभाल या दिहाड़ी के अलावा कोई कौशल नहीं। दोनों दलितों को सरकारी योजनाओं में सिर्फ़ बीपीएल राशनकार्ड की सुविधा का लाभ प्राप्त है। इसमें भी ड्राइवर का राशनकार्ड 2 महीने से अवैध हो चला है, क्योंकि वह आधार कार्ड से लिंक नहीं था और आधार कार्ड से ऑनलाइन लिंक करने वाले उसे अद्यतन करने की सुविधा नहीं दे पा रहे हैं और वह ऑफ़लाइन फॉर्म भर कर अब तक राशन कार्ड पुनः पाने के लिए भटक रहा है। चूँकि वह नौकरशाही और सरकारी तंत्र के जाल में पहले भी लिपट चुका है इसलिए वह मुतमईन है कि 'अभी इतनी जल्दी कहाँ उसका काम हो पाएगा।'
इन सभी की तीन या तीन से ज़्यादा संतानें हैं। इनकी कमाई 6 हज़ार मासिक के आसपास है। ड्राइवर की कुछ अधिक हो जाती है बाहरी स्रोतों से । इसीलिए वह अपनी एक संतान, ज़ाहिर है लड़के को, निजी स्कूल में भेज पाता है। लड़की को सरकारी प्राइमरी में भेजता है। ब्राह्मण व्यक्ति की संतानें प्राइमरी में जाती हैं। महिला की आय सबसे कम है। दिलचस्प है कि महिला, उसके पति और उसकी संतानें पान, गुटखा आदि के काफ़ी शौकीन हैं और अक्सर इस मद में वे धन की मांग करते रहते हैं। महिला का पति शराबी है। अक्सर महिला को गंभीर चोटें आई रहती हैं और वह आए दिन मायके चली जाती है। उसके जीवन की भेद्यता(वलनरेबिलिटी) बहुत अधिक है। पिता और भाई के हाथों अक्सर मार खाने वाली उसकी नाबालिग बेटी की शादी जल्दी ही हुई है, जिसमें काफी उदार मन से किसी धनवान परिवार ने सहयोग किया था। महिला की कोई संतान नहीं पढ़ती।
तीनों के परिवार में दो या दो से ज़्यादा लोग बीमार रहते हैं या दुर्घटना के चपेट में आये रहते हैं। उन्हें अब तक आरोग्य योजना के बारे में कोई जानकारी नहीं है। और जानकारी देने पर भी वे विशेष उत्सुक नहीं होते क्योंकि वे अब तक किसी सरकारी योजना से संतुष्ट नहीं हैं। इसके अलावा उनके पास जीवन के संघर्ष में फ़ुर्सत ही नहीं है कुछ 'फ़ालतू' बात सुनने की और इसीलिए वे अपने को साक्षर बनाने के लिए भी उत्सुक नहीं होते, कहने पर भी। तीनों के ही परिवारों में गृह-कलह एक आम बात है।
ज़ाहिर है, सरकारी नीतियाँ ज़मीनी स्तर पर कहाँ तक पहुँची हैं, इसकी उचित जाँच के लिए कोई विश्वसनीय प्रणाली इस डिजिटल युग में भी अब तक नहीं बन पायी है। शिक्षा, ब्रिज कोर्स, आर्थिक प्रोत्साहन, आर्थिक समावेशन, स्वास्थ्य सम्बन्धी योजना, रोज़गार इत्यादि का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक उन्हें सही लोगों तक सही तरीक़े से पहचान कर नहीं पहुंचाया जाता। 'गाँधी जी का जंतर' याद करना चाहिए। आज़ादी के इतने सालों बाद भी एक पूरी पीढ़ी अनपढ़ रहने को मजबूर है या उसे इसका महत्त्व नहीं मालूम तो इसका जिम्मेदार कौन है? सिर्फ एक परिवार या सिर्फ एक सरकार ? स्टैंड अप, स्टार्ट अप, मुद्रा, कौशल योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, उज्ज्वला वग़ैरह वग़ैरह -- कहाँ हैं ये सब? मेरे जानने वालों में कम से कम एक को तो लाभभोगी दिखना चाहिए था। मैं उन पर सवाल नहीं उठा रहा जिन्हें इन योजनाओं या प्रोत्साहनों का लाभ मिला। मैं सिर्फ अपने आसपास के कुछ हाशिए के उन लोगों को वर्णित कर रहा हूँ जिन्हें मैं ठीक से जानता हूँ। और मेरे जानने वाले कुछ अन्य नाई, मज़दूर वग़ैरह भी इसके लाभभोगी नहीं हैं, जिनकी कथा मैं बयान कर सकता हूँ। उन सबकी कथाएँ लगभग समान हैं।
यह कमोबेश एक चौथाई देश की हालत है. यह बीभत्स है. इससे कुछ अच्छी हालत भी अच्छी नहीं कही जायेगी. जबकि इससे बुरी हालत में भी लोग हैं. हर किसी (दल) के पास खाई बढ़ाने वाला विकास मॉडल है. मैं बुलेट ट्रेन, एक्सप्रेस वेज का हिमायती नहीं हूँ. मैं चाहता हूँ, कि पहले बुनियाद मजबूत हो, सारे लोग इन सुविधाओं को सब्सक्राइब करने योग्य हों तभी इन पर फोकस किया जाए. नहीं तो हाथी के दाँत वाली स्थिति में विज्ञापन होकर, सब धूसरित हो जाता है. जाहिर है कि, एक बड़ा-विविध मध्यम वर्ग ही सरकारें चुन रहा है और विज्ञापन से लेकर अभिलेखागार तक, हर जगह उसी का कब्जा है. विकसित होता देश, चलायमान अर्थव्यवस्था में उसी की आकांक्षाओं के इश्तिहार हैं. बाकी लोग अपनी अंतड़ियों के जाल में फँसे हुए हैं. आज भी देश का बहुत बड़े हिस्से की शक्ल पे गुदा हुआ है कि कहाँ है उसका देश ? कहाँ है उसके देश का वेलफेयर स्टेट ? कहाँ उसके सपनों की भागीदारी वाला लोकतंत्र? भारत का तंत्र उसके लिए उसकी अंतड़ियों के जाल की तरह है. जहाँ वह उलझकर रह गया है. बकौल मशहूर एनार्किस्ट, इवान इलिच- जितनी स्पीड, उतना गैप. गति बढ़ाते जाओ, खाईं बनाते जाओ.
ReplyDeleteविकास की देह शीशे की बनी है जबकि देश का बड़ा हिस्सा मक्खियों से बाते करता हुआ साँस लेता है.
बिल्कुल। एक प्रगतिशील और समावेशी विकास मॉडल किसी बड़ी पार्टी के विज़न में शामिल नहीं है, सिर्फ विरोध और पूंजीवाद की राजनीति है। जिनके पास विज़न है, उनके अपने आंतरिक अवरोध और समस्याएँ हैं। देश की समस्या विकट है। उसका कथित समाधान सिर्फ झुनझुना लगता है, आज़ादी से अब तक सभी 'महामानवों' के मुखारविंद से।
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